उद्योगपति भी नहीं ले पा रहे हैं नर्मदा-क्षिप्रा लिंक का महँगा पानी

इतने महँगे पानी को किसान कैसे खरीद पायेंगें?

 

मध्‍यप्रदेश की पिछली सरकार ने बड़े पैमाने पर नर्मदा से नदी जोड़ योजनाएँ प्रारंभ करवाई। नर्मदा से पहले क्षिप्रा को जोड़नेे का दावा किया गया। अब गंभीर, बेतवा और कालीसिंध नदियों को भी जोड़ा जा रहा है। 19 हजार 376 करोड़ रुपए की इन योजनाओं से मालवा में 4 लाख 80 हजार हेक्टर में सिंचाई का दावा किया जा रहा है।

नर्मदा-क्षिप्रा लिंक की इंदौर के पास मुण्‍डला दोस्‍तदार गांंव स्थित शिलान्‍यास पट्टिका

 

हालांकि दावे तो नर्मदा-क्षिप्रा लिंक के समय भी बड़े-बड़े किए गए थे। 432 करोड़ की इस योजना के शिलान्यास के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने कहा था कि इस परियोजना से मालवा के 70 शहर और तीन हजार गाँव को पानी मिलेगा। उद्योगों को पानी मिलेगा और खेतों में सिंचाई होगी। मालवा की उर्वरा भूमि को …… को हरा-भरा बनाने के हरसंभव कदम उठाये जाएँगे। इसी अवसर पर पूर्व उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा था कि यह योजना मालवा को पुनः जल क्षेत्र से परिपूर्ण होने का गौरव लौटाएगी। योजना से मालवा क्षेत्र में पानी की चिंता दूर हो जायेगी।

शिप्रा नदी का उद्गम माने गए इस स्‍थान पर नर्मदा का पानी पहले पहुँचता है

 

तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री श्री शिवराजसिंह ने 22 मार्च 2013 को इस योजना के लाभों को बढ़ाचढ़ा कर दिखाने वाला एक ट्वीट भी किया था।

जैसा बताया गया था, वैसा तो कुछ हुआ नहीं। न सिंचाई हुई, न क्षिप्रा कलकल छलछल बहने लगी। सरकार तो नर्मदा से उधार लेकर क्षिप्रा में नहाने तक का पानी नहीं दे पाई। 5 जनवरी 2019 की शनैश्चरी अमावस्या को क्षिप्रा में पानी की कमी होने पर कलेक्टर और कमिश्नर दोनों की छुट्टी जरुर हो गई थी।

हाँ, इस योजना के एकमात्र लक्ष्य पर पूरी ईमानदारी से प्रयास किया जा रहा है। यह लक्ष्य है – उद्योगों को लिए पानी। जी हाँ, इस योजना का यही एकमात्र लक्ष्य था जिसके लिए बड़े-बड़े झूठे दावे कर जनता को बेवकूफ बनाया गया।

लेकिन, अब इस योजना का एकमात्र लक्ष्य भी संदिग्ध हो गया गया है। इस योजना का पानी महँगा होने के कारण अब उद्योगों की इसमें रुचि नहीं रह गई है। उद्योग अब फिर से अपने परम्परागत स्रोतों से पानी लेने लगे हैं।

इन तथाकथित नदीजोड़ योजनाओं में संचालन-संधारण लागत की संपूर्ण वसूली की शर्त है, इसीलिए इनसे प्रदाय किए जाने वाले पानी की दरें अधिक है। अब सवाल उठता है कि इन योजनाओं के महँगे पानी का उपयोग यदि उद्योग भी नहीं कर पा रहे हैं तो किसान कैसे उपयोग कर पायेंगें?

नीचे कुछ नर्मदा लिंक योजनाओं के प्रति हेक्टर सिंचाई शुल्क जानकारी दी गई है। इनसे अंदाजा लगाईए कि देश का कौन सा किसान अपने खेत की सिंचाई पर 33 हजार रुपए से लेकर 57 हजार रुपए प्रति हेक्टर की दर से भुगतान कर पाएगा?

 

इसी प्रकार मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी से 27 लिफ्ट सिंचाई योजनाएँ भी निर्माणाधीन या प्रस्तावित है। आदिवासी इलाकों की कुछ लिफ्ट सिंचाई योजनाओं की सिंचाई दरों का ब्यौरा भी देख लिजिए और जश्न मनाईए कि हमारे देश का किसान कितना समृद्ध हो रहा है –

नर्मदा-क्षिप्रा लिंक योजना वर्तमान में मुख्य रुप से एक वाटर पार्क की तरह चलाई जा रही है। रविवार और कभी-कभी छ़ट्टियों के दिन सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक चलाई जाती है, जहाँ इंदौर और आसपास के लोग आकर इस वाटर पार्क का आनंद उठाते हैं। पर्यटकों के लिए तो बस यही है नर्मदा से क्षिप्रा का सफलतापूर्वक नदी जोड़।

नर्मदा-क्षिप्रा संगम पर वाटर पार्क

जलक्रीड़ा के बाद वाटर पार्क से निकले पानी से पिछले सालों में कुछ खेतों में सिंचाई जरुर हुई। लेकिन, सरकार की हिम्मत नहीं हुई किसानों से पैसा वसूलने की। यह बात ओर है कि सरकार ने इसे पानी की चोरी माना और किसानों की सिंचाई रोकने का प्रयास भी किया।

हालांकि, अब ऐसी नौबत नहीं आएगी क्योंकि अब सरकार ने किसानों द्वारा पानी की चोरी रोकने के लिए 139 करोड़ रुपए खर्च कर उज्जैन तक पाईप लाईन डाल दी है। संक्षेप में, पूरे मालवा की धरती को हरा-भरा करने का दावा करने वाली योजना के लिए किसान ही असली खलनायक साबित हुए। किसानों ने 432 करोड़ के बाद पाईप लाईन पर सरकार के 139 करोड़ और खर्च करवा दिए।

प्रतीक्षा कीजिए। अन्य लिंक योजनाओं का हश्र भी नर्मदा- क्षिप्रा लिंक की तरह ही होने वाला है क्योंकि, इनका लक्ष्य वह है ही नहीं जो प्रचारित किया जा रहा है।

माँग न होने पर भी नए बिजलीघर क्‍यों?

मोदी सरकार की पहली सालगिरह की उपलब्धियों के शोर में यह दुखद खबर कहीं दब गई है कि देश में इस अप्रैल-मई की भीषण गर्मी के दौर में भी बिजली की माँग स्‍थापित क्षमता के मुकाबले मात्र आधी थी। इस कारण दर्जनों विद्युत संयंत्रों को बंद करना पड़ा है। ज्‍यादातर संयंत्रों को बंद करने का कारण रिजर्व शट-डाउन बताया गया है कि जिसका अर्थ होता है मांग की कमी के कारण बंद किया जाना। बंद कर दिए गए आधे से अधिक संयंत्रों का पानी की नली में रिसाव जैसा मामुली कारण दिया गया है जो अविश्‍वसनीय है क्‍योंकि इस प्रकार की खराबी जल्‍दी ही आसानी से सुधारी जा सकती है।

माँग में कमी के कारण बंद कर दिए गए बिजलीघरों की सूची में सारे बिजलीघर सार्वजनिक क्षेत्र के हैं जो संभवत: सस्‍ती बिजली पैदा करते हैं। लेकिन निजी बिजलीघर निर्बाध रुप से जारी हैं और राज्‍यों की विदयुत वितरण कंपनियाँ उनकी बिजली खरीद भी रही हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार देश की बिजली उत्‍पादन क्षमता 2,68,603 मेगावाट है जबकि मई माह की इस झुलसाती गर्मी में भी बिजली मांग मात्र 1,34,892 मेगावाट यानी कुल स्‍थापित क्षमता की आधी थी। याद रहे कि बिजली की सर्वाधिक माँग गर्मी के दिनों में होती है। इस वर्ष देश में भीषण गर्मी का दौर जारी है और मई के अंत तक गर्मी से मरने वालों का आँकड़ा 2200 को पार कर चुका था। लेकिन इस भीषण गर्मी के दौर में भी बिजली की माँग लगभग स्‍थिर ही बनी रहीं।

देश में बिजली की कमी का हौआ इक्‍कीसवी सदी की शुरुआत से बनाया जा रहा था। सरकार और कार्पोरेट द्वारा यह प्रचारित किया गया कि देश में बिजली की भारी कमी है और यह कमी देश की प्रगति में बाधक बनेगी और देश सुपर पॉवर बनने से वंचित हो जाएगा। इस तर्क के बल पर देशभर में किसानों का दमन करते हुए उनकी जमीनें जबरन छीनी गई और कई बिजली संयंत्र (ज्‍यादातर निजी) स्‍थापित किए गए। इसके लिए सरकारों ने कॉर्पोरेट घरानों को लाखों करोड़ की सब्सिडी बगैर गारंटी के कर्ज (इंटर कॉर्पोरेट डिपाजिट) दिए। केवल इतना ही निजी कंपनियों से ऐसे आत्‍मघाती बिजली खरीद समझौते कर लिए गए कि देश को सरकार-कॉर्पोरेट गठजोड़ का खामियाजा पीढ़ियों तक भुगतना पड़ेगा। इन बिजली खरीद समझौतों में बिजली की दरें भी ऊँची स्‍वीकार की गई है और  बिजली खरीदी की गारण्‍टी भी दी गई है।

बिजली खरीद समझौते की शर्तों के कारण ही महाराष्‍ट्र के दाभोल स्थित एनरॉन बिजली परियोजना से महाराष्‍ट्र सरकार को अत्‍यधिक महँगी बिजली खरीदने को बाध्‍य होना पड़ा था। अंत में परियोजना बंद करनी पड़ी और इसका सारा भार सरकार को वहन करना पड़ा क्‍योंकि परियोजना में लगाया गया अधिकांश धन सार्वजनिक क्षेत्र से लिया गया कर्ज था। उल्‍लेखनीय है कि एनरॉन परियोजना की स्‍वीकृति में कांग्रेस और भाजपा दोनों का योगदान रहा था। परियोजना पर बातचीत कांग्रेस को शासन काल में प्रारंभ हुई थी लेकिन इसे काउण्‍टर गारण्‍टी श्री अटलबिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार ने 1996 में दी थी। स्‍वदेशी की राजनीति करने वाले राष्‍ट्रवादी विचारधारा वाले श्री वाजपेयी ने बाद में विवादस्‍पद एनरॉन समझौते का समर्थन करने के अपने इस निर्णय को यह कहकर उचित ठहराया था कि देश के ऊर्जा क्षेत्र में तकनीक और बड़े निवेश की जरुरत है जो सिर्फ विदेश से ही आ सकती है।

व़र्तमान में बिजली की कम माँग होने के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के बिजलीघरों को बंद कर दिया गया है और निजी बिजली संयंत्रों की बिजली खरीदी (कई बार महँगी) जा रही है।

1200 मेगावाट क्षमता वाले खण्‍डवा (मध्‍यप्रदेश) के सिंगाजी ताप बिजली संयंत्र के पहले चरण का उद्घाटन और 1320 मेगावाट के दूसरे चरण का शिलान्‍यास प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी द्वारा 5 मार्च 2015 को किया गया। लेकिन कम माँग के कारण उद्घाटन के तुरंत बाद ही इसे बंद कर दिया गया। लेकिन, मध्‍यप्रदेश के सीधी (सासन) स्थित रिलायंस का थर्मल पॉवर प्रोजेक्‍ट चालू है और मध्‍यप्रदेश वितरण कंपनी इससे बिजली खरीद रही है। मीडिया में खबरें आने के बाद सिंगाजी ताप बिजलीघर को एक बार कम क्षमता से प्रारंभ किया गया था।

DB 31 May 2015 Singaji Power Plant

Photo Source – Dainik Bhaskar, Khandwa Edition, 31 May 2015

सिंगाजी ताप विद्युत परियोजना की लागत 7,820 करोड़ रुपये आई है जबकि इसके दूसरे चरण की लागत 6,500 करोड़ बताई गई है। श्री मोदी के अनुसार यह विद्युत संयंत्र औसत लागत से कम में बनाया गया है।

श्री मोदी ने सिंगाजी बिजली संयंत्र का उद्घाटन करते समय बिजली को विकास की कुंजी बताते हुए सभी को बिजली उपलबध करवाने की बचनबध्‍दता दर्शाई थी। उन्‍होंने यह दावा भी किया था कि उनके तब तक के 9-10 माह के कार्यकाल में बिजली उत्‍पादन 11 प्रतिशत बढ़ा है।

केंद्रीय बिजली और कोयला मंत्री पीयूष गोयल ने 27 मई 2015 को मोदी सरकार की पहले वर्ष की उपलब्धियॉं गिनाते हुए कहा कि पिछले एक साल में 22,566 मेगावॉट बिजली क्षमता जोड़ी गई है।

अब सवाल उठता है कि देश में सर्वाधिक जरुरत के समय भी यदि बिजली की  मांग उसकी उत्‍पादन क्षमता से आधी ही है तो फि‍र नए बिजलीघर बनाने की क्‍या जरुरत है? नए बनाए जा रहे है (या आवश्‍यकता से अधिक बनाए जा चुके) बिजलीघर  देश पर बोझ नहीं है? इन बिजलीघरों के निर्माण में लगने वाले संसाधन सामाजिक विकास के क्षेत्रों में खर्च नहीं किए जा सकते? यदि नए बनने वाले विद्युत संयंत्र निजी क्षेत्र के हैं तो विद्युत क्रय समझौतों के कारण इसकी कीमत लम्‍बे समय तक नहीं चुकानी होंगी?

संभव है सरकार देश में विद्युत क्षमता बढ़ाने की अपनी इस उपलब्धि को भविष्‍य में भी जारी रखेगी। लेकिन, इसके प्रभावों के प्रति सतर्क रहने की जरुरत है।

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सिंगाजी ताप विद्युत संयंत्र के उद्घाटन में किसने क्‍या कहा

बिजली के उत्पादन को बढ़ाना और इसकी कमी को तेजी से पूरा करना हमारी प्राथमिकता है। देश के हर कोने में नये ऊर्जा संयंत्र स्थापित किये जा रहे हैं। बीते दस माह में विद्युत उत्पादन में 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह इस बात का उदाहरण है कि विकास किस तेजी से किया जा सकता है। ……… मध्यप्रदेश में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी उस समय जितनी बिजली उत्पादित होती थी उतनी अब केवल संत श्री सिंगाजी परियोजना से उत्पादित होगी। हम देश में कम लागत में सस्ती ऊर्जा का क्षेत्र तैयार करने के प्रयास कर रहे हैं। इसके लिये परमाणु ऊर्जा संयंत्र के प्रयास किये जा रहे हैं।

– श्री नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

मध्यप्रदेश अब ऊर्जा उत्पादन में आत्म-निर्भर हो गया है। अगले दो साल में 20 हजार मेगावाट ऊर्जा राज्य में पैदा होगी। जरूरतमंद राज्यों को देने में भी प्रदेश सक्षम होगा।

– श्री शिवराजसिंह चौहान, मुख्‍यमंत्री-मध्‍यप्रदेश

संदर्भ
दैनिक भास्कर, 16 मई 2015
http://epaper.bhaskar.com/detail/?id=779797&boxid=51632012789&ch=mpcg&map=map&currentTab=tabs-1&pagedate=05/16/2015&editioncode=362&pageno=4&view=image

दि इण्डियन एक्सप्रेस, 26 मई 2015
http://indianexpress.com/article/india/india-others/slowdown-signal-heat-is-on-but-power-demand-flat/

दैनिक भास्कर, 26 मई 2015
http://epaper.bhaskar.com/detail/?id=785885&boxid=52635938672&ch=mpcg&map=map&currentTab=tabs-1&pagedate=05/26/2015&editioncode=362&pageno=1&view=image

इण्डिया रिसोर्स
http://www.indiaresource.org/issues/energycc/2003/enronsagaalesson.html

बिजनेस स्टेण्डर्ड, ऑनलाईन संस्करण, 27 मई 2015
http://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=103133

श्री नरेन्द्र मोदी की वेबसाईट
http://www.narendramodi.in/pms-remarks-on-the-occasion-of-dedication-to-the-nation-of-stage-1-of-shree-singaji-thermal-power-plant-at-khandwa

मध्‍यप्रदेश सरकारी की सूचना प्रकाशन विभाग की वेबसाईट पर 5 मार्च 2015 को जारी बयान
http://mpinfo.org/

दुनिया में पुनर्निगमीकरण का जोर

हाल ही में इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता में जलप्रदाय के निजीकरण अनुबंध को स्थानीय अदालत ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इससे शहर के 99 लाख रहवासियों के पानी के मानवाधिकार का उल्लंघन हो रहा है। जकार्ता में पानी का निजीकरण अनुबंध खत्म किया जाना सेवाओं के कंपनीकरण के खिलाफ जारी जन संघर्षों की एक महत्त्वपूर्ण जीत होकर एक उल्लेखनीय घटना है। जकार्ता की जलप्रदाय व्यवस्था का निजीकरण दुनिया के शुरूआती बड़े निजीकरणों में शामिल था। 18 वर्ष पूर्व स्थानीय शहरी निकाय ने जलप्रदाय व्यवस्था का ठेका पाम लियोनेज जया और आयत्रा आयर जकार्ता नाम की निजी कंपनियों के समूह को दिया गया था।

ठेका देते समय जलप्रदाय व्यवस्था के सुधार का आश्वासन दिया गया था लेकिन निजी कंपनियों ने सेवा का स्तर गिरा दिया। खराब सेवा के कारण कंपनियों से किया गया अनुबंध खत्म करने की माँग के साथ स्थानीय समुदाय ने लंबा अभियान चलाया। अभियान की ओर से निजीकरण अनुबंध को स्थानीय न्यायालय में चुनौती दी गई और अंततः न्यायालय ने इस अनुबंध को खारिज कर दिया। अब स्थानीय शहरी निकाय ने जलप्रदाय व्यवस्था पुनः अपने हाथ में ले ली है। जलप्रदाय और स्वच्छता सेवाओं के निजी क्षेत्र से नगरीय निकायों के अधिकार क्षेत्र में अंतरण को पुनर्निगमीकरण कहा जाता है। जकार्ता का पुनर्निगमीकरण दुनिया का सबसे बड़ा पुनर्निगमीकरण है और इसका यह अर्थ लगाया जा रहा है कि पानी के निजीकरण का दौर खत्म हो रहा है और समयचक्र अब फिर से घूमते हुए बेहतर जवाबदेह, और स्थायी सार्वजनिक जलप्रदाय की ओर बढ़ रहा है। लातूर (महाराष्ट्र) सहित दुनियाभर में अब ऐसे उदाहरण दिखाई देने लगे हैं।

ट्रांसनेशलन इंस्टीटयूट, मल्टीनेशलन ऑब्जरवेटरी और पीएसआईआरयू नामक स्वयंसेवी समूहों ने हाल ही में पुनर्निगमीकरण की विश्वव्यापनी घटनाओं का अध्ययन कर ‘‘अवर पब्लिक वाटर फ्यूचरः द ग्लोबल एक्सपिरियंस विथ रिम्युनिसिपलाईजेशन’’ शीर्षक से एक रिपोर्ट पुस्तक के रूप में प्रकाशित की है। इस रिपोर्ट में उभरते पुनर्निगमीकरण के विश्वव्यापी रूझानों की ओर ध्यान दिलाते हुए पानी के निजीकरण के भविष्य पर बड़े सवाल खड़े किए गए हैं।

पुनर्निगमीकरण की ओर रूझान

रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2000 और मार्च 2015 के बीच 37 देशों के 235 नगरीय निकायों में पानी के पुनर्निगमीकरण से 10 करोड़ नागरिक लाभांवित हुए। आश्यर्चजनक तथ्य यह है कि इनमें से 184 मामले उच्च आय वाले देशों के हैं तथा शेष 51 मामले कम आय वाले देशों के हैं। ज्यादातार मामले फ्रांस और अमेरिका के हैं जहाँ क्रमशः 94 और 58 नगरीय निकायों ने पुनर्निगमीकरण किया। वर्ष 2000 और 2010 की अपेक्षा 2010 और 2015 के मध्य पुनर्निगमीकरण की दर दुगनी हो गई जिससे सिद्ध होता है कि पुनर्निगमीकरण की ओर रूझान बढ़ रहा है। अध्ययन में इस बात का भी उल्लेख है कि पुनर्निगमीकरण अपना चुके कई देशों के नगरीय निकाय अब पुनर्निगमीकरण की प्रक्रिया को अन्य देशों में आगे बढ़ाने में मदद कर रहे हैं।

पुनर्निगमीकरण की ओर रूझान

पुनर्निगमीकरण की प्रक्रिया से एक बार फिर सिद्ध हुआ है कि निजी कंपनियों की की बजाय सार्वजनिक क्षेत्र बेहतर सेवाएँ प्रदान कर सकता है। इस प्रक्रिया के दौरान देखा गया कि बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा हथियाई गई निजीकृत जलप्रदाय व्यवस्थाएँ समुदाय की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी इसलिए उन्हें कड़े विरोध का सामाना करना पड़ा। खराब सेवा और पानी की खराब गुणवत्ता के लिए अकरा (घाना), दार-ए-सलाम (तंजानिया), जकार्ता (इण्डोनेशिया), रेने (फ्रांस) और केमराॅन सिटी (अमेरिका) का निजीकरण बदनाम रहा है। बर्लिन (जर्मनी), ब्यूनस आयर्स (अर्जेंटीना) और लातूर (भारत) में निजी कंपनियों ने बुनियादी सेवाओं पर निवेश नहीं किया जिससे स्थानीय समुदाय ने इन्हें खारिज कर दिया। अलमाटी (कजाखिस्तान), मापूतो (मोजाम्बिक) सांता फे (अमेरिका), जकार्ता (इण्डोनेशिया), ब्यूनस आयर्स (अर्जेंटीना), लापाज (बोलिविया) और कुआलालंपुर (मलेशिया) में अनुबंधकर्ता कंपनियों ने संचालन खर्च और जलदरों में बेतहाशा वृद्धि की थी। ग्रेनोबल, पेरिस (फ्रांस) और स्टुटगार्ड (जर्मनी) में निजी जलप्रदायकों ने अपने फायदे के लिए वित्तीय पारदर्शिता और अटलांटा (अमेरिका), बर्लिन (जर्मनी) और पेरिस (फ्रांस) में सार्वजनिक निगरानी से परहेज किया। अंतालिया (तुर्की) और अटलांटा (अमेरिका) में कर्मचारियों की छँटनी और खराब सेवा के कारण पुनर्निगमीकरण करना पड़ा। हेमिल्टन (कनाड़ा) में निजीकरण अनुबंध खारिज करने का कारण पर्यावरणीय समस्याएँ थी।

पुस्तक में दुनियाभर के 235 पुनर्निगमीकरण प्रकरणों का उल्लेख है जिनमें से 92 निजीकृत अनुबंध टिकाऊ नहीं होने के कारण नगरीय निकायों ने स्वयं इन्हें समाप्त करने का फैसला किया। शेष मामलों में या तो अनुबंध का नवीनीकरण नहीं किया गया अथवा निजी कंपनियाँ स्वयं ही अलग हो गई है।

पुनर्निगमीकरण के परिणाम

वैसे तो रिपोर्ट में उल्लेखित हर मामला अपने आप में अलग है लेकिन पुनर्निगमीकरण से खर्च में कमी, संचालन क्षमता में वृद्धि, जलप्रदाय तंत्र में निवेश और पारदर्शिता होने के ठोस प्रमाण मिले हैं। इसके अतिरिक्त रिपोर्ट में पुनर्निगमीकरण से सार्वजनिक जलप्रदाय सेवाओं को ज्यादा जवाबदेह, सहभागी और पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ बनाने में मदद मिलने के प्रमाण दिए गए हैं। पेरिस की नगरपालिका को जलप्रदाय का निजीकरण खत्म करने पर पहले ही वर्ष में साढ़े 3 करोड़ यूरो (करीब 231 करोड़ रूपए) की बचत और ह्यूस्टन (अमेरिका) की नगरपालिका को सालाना 20 लाख डाॅलर (करीब साढ़े बारह करोड़ रूपए) की सालाना बचत हुई। पुनर्निगमीकरण के बाद दार-ए-सलाम (तंजानिया), बर्लिन (जर्मनी) और मेदिना सिदोनिया (स्पेन) में जलप्रदाय तंत्र में काफी निवेश बढ़ा तथा पेरिस और ग्रेनोबल (फ्रांस) में पारदर्शिता और जवाबदेही में बढ़ोत्तरी देखी गई। ब्यूनस आयर्स (अर्जेंटीना) में जल दरें कम हुई जिससे सभी को पानी मिलना और उसका समतामूलक बँटवारा सुनिश्चित हुआ। अध्ययन में कुछ ऐसे मामलों का भी उल्लेख है जिनमें निजी कंपनियाँ पुनर्निगमीकरण के खिलाफ कोर्ट में गई और नगरीय निकायों से हर्जाना भी माँगा गया।

अध्ययन के निष्कर्ष

पुस्तक में पुनर्निगमीकरण के दौर में मिले सबकों की विस्तृत विवेचना है। जो निकाय जलप्रदाय को सार्वजनिक क्षेत्र में लाना चाहते हैं उनकी सहायता के लिए पुस्तक में एक चैकलिस्ट दी गई है। निजीकरण या पब्लिक-प्रायवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के बदले नगरीय निकायों की क्षमता वृद्धि हेतु पब्लिक-पब्लिक पार्टनरशिप (पीयूपी) मॉडल सुझाया गया है जिसमें नगरीय निकायों के साथ जनता या अन्य सार्वजनिक निकायों की भागीदारी होती है। जकार्ता से लेकर पेरिस और जर्मनी से लेकर अमेरिका तक के पुनर्निगमीकरण अभियानों के अनुभवों के आधार पर अध्ययनकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि इससे वर्तमान और आने वाली पीढि़यों को सामाजिक दृष्टि से बेहतर, पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ और अच्छी गुणवत्ता की सेवाएँ प्रदान की जा सकती है।

अध्ययनकर्त्ताओं ने पुनर्निगमीकरण को ट्रेड यूनियनों के लिए एक अवसर बताते हुए कहा है कि इससे कार्य स्थल की परिस्थितियों में भी सुधार लाया जा सकता है। इसके आलावा सार्वजनिक जलप्रदाय में लगे कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाई जा सकती है और सार्वजनिक सेवाओं की दरों को और बेहतर बनाया जा सकता है।

पुस्तक में अध्ययन के अनुभवों, सबकों और बेहतर तरीकों द्वारा नागरिकों, कर्मचारियों और नीति निर्माताओं सहित सभी को जोड़ने का प्रयास किया गया है ताकि जीवन के आधार पानी को फिर से सार्वजनिक क्षेत्र में लाया जा सके। भारत भी पानी के निजीकरण से अछूता नहीं हैं। खण्डवा, शिवपुरी, नागपुर, औरंगाबाद, नई दिल्‍ली, मैसूर  जैसे शहरों में जलप्रदाय के निजीकरण के खिलाफ स्थानीय समुदाय आंदोलनरत् है। ऐसे में गहन शोध के बाद तैयार इस पुस्तक के अनुभव भारत के लिए भी महत्त्वपूर्ण हैं।

(गौरव द्विवेदी के साथ)