उद्योगपति भी नहीं ले पा रहे हैं नर्मदा-क्षिप्रा लिंक का महँगा पानी

इतने महँगे पानी को किसान कैसे खरीद पायेंगें?

 

मध्‍यप्रदेश की पिछली सरकार ने बड़े पैमाने पर नर्मदा से नदी जोड़ योजनाएँ प्रारंभ करवाई। नर्मदा से पहले क्षिप्रा को जोड़नेे का दावा किया गया। अब गंभीर, बेतवा और कालीसिंध नदियों को भी जोड़ा जा रहा है। 19 हजार 376 करोड़ रुपए की इन योजनाओं से मालवा में 4 लाख 80 हजार हेक्टर में सिंचाई का दावा किया जा रहा है।

नर्मदा-क्षिप्रा लिंक की इंदौर के पास मुण्‍डला दोस्‍तदार गांंव स्थित शिलान्‍यास पट्टिका

 

हालांकि दावे तो नर्मदा-क्षिप्रा लिंक के समय भी बड़े-बड़े किए गए थे। 432 करोड़ की इस योजना के शिलान्यास के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने कहा था कि इस परियोजना से मालवा के 70 शहर और तीन हजार गाँव को पानी मिलेगा। उद्योगों को पानी मिलेगा और खेतों में सिंचाई होगी। मालवा की उर्वरा भूमि को …… को हरा-भरा बनाने के हरसंभव कदम उठाये जाएँगे। इसी अवसर पर पूर्व उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा था कि यह योजना मालवा को पुनः जल क्षेत्र से परिपूर्ण होने का गौरव लौटाएगी। योजना से मालवा क्षेत्र में पानी की चिंता दूर हो जायेगी।

शिप्रा नदी का उद्गम माने गए इस स्‍थान पर नर्मदा का पानी पहले पहुँचता है

 

तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री श्री शिवराजसिंह ने 22 मार्च 2013 को इस योजना के लाभों को बढ़ाचढ़ा कर दिखाने वाला एक ट्वीट भी किया था।

जैसा बताया गया था, वैसा तो कुछ हुआ नहीं। न सिंचाई हुई, न क्षिप्रा कलकल छलछल बहने लगी। सरकार तो नर्मदा से उधार लेकर क्षिप्रा में नहाने तक का पानी नहीं दे पाई। 5 जनवरी 2019 की शनैश्चरी अमावस्या को क्षिप्रा में पानी की कमी होने पर कलेक्टर और कमिश्नर दोनों की छुट्टी जरुर हो गई थी।

हाँ, इस योजना के एकमात्र लक्ष्य पर पूरी ईमानदारी से प्रयास किया जा रहा है। यह लक्ष्य है – उद्योगों को लिए पानी। जी हाँ, इस योजना का यही एकमात्र लक्ष्य था जिसके लिए बड़े-बड़े झूठे दावे कर जनता को बेवकूफ बनाया गया।

लेकिन, अब इस योजना का एकमात्र लक्ष्य भी संदिग्ध हो गया गया है। इस योजना का पानी महँगा होने के कारण अब उद्योगों की इसमें रुचि नहीं रह गई है। उद्योग अब फिर से अपने परम्परागत स्रोतों से पानी लेने लगे हैं।

इन तथाकथित नदीजोड़ योजनाओं में संचालन-संधारण लागत की संपूर्ण वसूली की शर्त है, इसीलिए इनसे प्रदाय किए जाने वाले पानी की दरें अधिक है। अब सवाल उठता है कि इन योजनाओं के महँगे पानी का उपयोग यदि उद्योग भी नहीं कर पा रहे हैं तो किसान कैसे उपयोग कर पायेंगें?

नीचे कुछ नर्मदा लिंक योजनाओं के प्रति हेक्टर सिंचाई शुल्क जानकारी दी गई है। इनसे अंदाजा लगाईए कि देश का कौन सा किसान अपने खेत की सिंचाई पर 33 हजार रुपए से लेकर 57 हजार रुपए प्रति हेक्टर की दर से भुगतान कर पाएगा?

 

इसी प्रकार मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी से 27 लिफ्ट सिंचाई योजनाएँ भी निर्माणाधीन या प्रस्तावित है। आदिवासी इलाकों की कुछ लिफ्ट सिंचाई योजनाओं की सिंचाई दरों का ब्यौरा भी देख लिजिए और जश्न मनाईए कि हमारे देश का किसान कितना समृद्ध हो रहा है –

नर्मदा-क्षिप्रा लिंक योजना वर्तमान में मुख्य रुप से एक वाटर पार्क की तरह चलाई जा रही है। रविवार और कभी-कभी छ़ट्टियों के दिन सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक चलाई जाती है, जहाँ इंदौर और आसपास के लोग आकर इस वाटर पार्क का आनंद उठाते हैं। पर्यटकों के लिए तो बस यही है नर्मदा से क्षिप्रा का सफलतापूर्वक नदी जोड़।

नर्मदा-क्षिप्रा संगम पर वाटर पार्क

जलक्रीड़ा के बाद वाटर पार्क से निकले पानी से पिछले सालों में कुछ खेतों में सिंचाई जरुर हुई। लेकिन, सरकार की हिम्मत नहीं हुई किसानों से पैसा वसूलने की। यह बात ओर है कि सरकार ने इसे पानी की चोरी माना और किसानों की सिंचाई रोकने का प्रयास भी किया।

हालांकि, अब ऐसी नौबत नहीं आएगी क्योंकि अब सरकार ने किसानों द्वारा पानी की चोरी रोकने के लिए 139 करोड़ रुपए खर्च कर उज्जैन तक पाईप लाईन डाल दी है। संक्षेप में, पूरे मालवा की धरती को हरा-भरा करने का दावा करने वाली योजना के लिए किसान ही असली खलनायक साबित हुए। किसानों ने 432 करोड़ के बाद पाईप लाईन पर सरकार के 139 करोड़ और खर्च करवा दिए।

प्रतीक्षा कीजिए। अन्य लिंक योजनाओं का हश्र भी नर्मदा- क्षिप्रा लिंक की तरह ही होने वाला है क्योंकि, इनका लक्ष्य वह है ही नहीं जो प्रचारित किया जा रहा है।